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""उलझन""

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ले चल ऐ मुकद्दर किसी और जहान
इस शहर मे अब वो बात कहॉं ....
होते तो है दिन और रात यहॉं

पर दिन मे चहक न रातो मे महक 

 

  दिखते तो हैं  कई लोग हर तरफ़
चेहरे पे हसीं ना आखों मे चमक...
होती तो है बरसात भी हर शाम यहॉं
पर भीगने कि चाहत वो एहसास कहॉं ....|


नही दिखती  पाकीजा मुहब्ब्त की झलक
जाने  कैसी  है  अब रिश्तों  मे  कसक...
लगा के सीने से दिल चीरते हैं सब
और शान से कहते हैं "ये है रिवाज मियॉ"...|

 

 है अजीब उलझन ऎ गालिब..!!!!!!
तू ही कर इस शहर कि बानगी को बयॉं ....
मुझे न होश हुं मै कहॉं और मेरा खुदा कहॉं .....|||

_ALOK_

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